राधा कुंड

 

भक्ति का पर्याय-बृजभूमि, स्वयं से साक्षात्कार की अद्भुत अनुभूति का, एक दिव्य प्रमाण है । इसी पवित्र भूमि पर गोवर्धन के पास स्थित है राधा कुंड जिसके प्राचीन एवं धार्मिक महत्व की महिमा-मंडन सम्पूर्ण जगत करता है । आइये जानते है राधा कुंड के सार्थक महत्व को-

 

श्री कृष्ण के अवतरण का महान उद्देश्य धर्म की पूर्ण स्थापना एवं मानव कल्याण से विपरीत अनैतिक कार्यों में लिप्त राक्षसों का वध था । अपनी मृत्यु के भय से ग्रसित मथुरा का राजा कंस अपने भांजे की हत्या हेतु आये दिन किसी ना किसी राक्षस को भेजता और वो राक्षस श्री कृष्ण के हाथों वध के कारण अपनी मृत्यु को प्राप्त होता । ऐसे ही एक बार कंस ने अरिष्टासुर नामक एक राक्षस को भेजा जो बैल स्वरूप में कृष्ण को खोजते हुए वृन्दावन आया । विराट, गुस्सैल और भयानक बैल को आता देख वृन्दावन वासियों में अफरा तफरी मच गयी l

 

जैसे ही उसने भगवान् श्री कृष्ण को देखा वो उनपे आक्रमण करने के लिए दौड़ पड़ा l श्री कृष्ण ने तत्क्षण अरिष्टासुर का संहार कर दिया l तत्पश्चात माधव अपने मित्रों सहित , श्रीमती राधारानी और अन्य गोपियों से मिलने गोवर्धन गए जहाँ श्री राधा ने कृष्ण को सम्पूर्ण जगत में अलग अलग जगह स्थित पवित्र नदियों में पवित्र स्नान कर, बैल वेश में आये असुर को मारने का पाप धोने के लिए अनुग्रह किया l कृष्ण ने ठिठोली करते हुए कहा, “मुझे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है राधे” और ऐसा कहते हुए उन्होंने अपना पैर जोर से धरती पे दे मारा और एक कुंड स्वरूप की संगरचना की l उनके केवल स्मरण करने लेने मात्र से गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, कावेरी, आदि सभी पवित्र नदियां उस कुंड में समाहित हो गयी l  जिसके बाद भगवान् श्री कृष्ण ने, श्री राधा को प्रसन्न करने के लिए उस जल में स्नान करके अपने पाप धोये l और इस कुंड का नाम पड़ा, श्याम कुंड l

 

यह देख श्री राधा अपनी सखियों संग, अरिष्टासुर के विराट पद्दचिह्न से बने खड्डे को अपने हाथ में पहने कड़े और चूड़ियों से खोदने लगी और उसे कुंड का स्वरुप दिया l इस कुंड में पानी भरने हेतु श्री राधा एवं अन्य गोपियाँ "मानसी-गंगा" से पानी लाकर इस कुंड में भरने लगी।  जब श्री कृष्ण ने उन सभी का यह अथक प्रयास देखा तब उन्होंने श्याम कुंड में समाहित सभी पवित्र नदियों को आज्ञा दी की वे श्री राधा से हठ अनुरोध करें और उनकी सहायता करें l 

उसी क्षण सभी नदियां राधारानी के समक्ष प्रकट हुई और उनसे प्रार्थना की कि वे उनकी सहायता को स्वीकार करें l श्रीमती राधारानी की स्वीकृति मिलते ही अपने पवित्र जल से राधारानी की सेवा करते हुए राधा कुंड को भर दिया l और इस तरह राधारानी के असीम भक्ति से ओतप्रोत, भगवान श्री कृष्ण का अतिप्रिय राधाकुंड प्रकट हुआ l

 

श्री जीव गोस्वामी ने श्रीमद भागवतम 10.45.3 में इसको प्रमणित किया है कि चैत्र पूर्णिमा, श्री राधा कुंड का वास्तविक प्राकट्य दिवस  है: “भगवान श्री कृष्ण ने चैत्र की पूर्णिमा के दिन अरिष्टासुर का वध किया था।”  (चैत्र-पौर्णमास्याम् अरिष्ट-वधः) जब श्री कृष्ण मात्र ग्यारह वर्ष के थे [और तब राधा-कृष्ण ने श्याम कुंड और राधा कुंड प्रकट किए थे]।" पुराणों में इस वर्णित अद्भुत स्वरूप लीला का हम वंदन करते हैं ।

 

आदरणीय श्रील रूपा गोस्वामी अपनी किताब “श्री उपदेशमिरत” में लिखते है, जिस प्रकार श्रीमती राधारानी कृष्ण को प्रिये है उसी प्रकार राधा कुंड भी उनको अतिप्रिय है l यदि कोई भक्त राधा कुंड में स्नान कर ले तो उसे श्री राधा-कृष्ण के भक्ति और कृपा का परम सौभाग्य प्राप्त हो जायेगा l

राधा कुंड प्राकट्य दिवस

गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के अनुसार, 5000 वर्ष पूर्व श्री कृष्ण के द्वारा राधा-श्याम कुंड का प्रकटीकरण अरिष्टासुर वध उपरांत चैत्र पूर्णिमा के दिन हुआ था l 500 वर्ष पूर्व जब अपनी तीर्थयात्रा के दौरान श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन पधारें तब, समयचक्र में लुप्त हुए राधा कुंड को, कार्तिक मास की बहुलाष्टमी के शुभ दिन पर पुनः अनावृत कर उन्होंने इसके सम्पूर्ण महत्व से सबको अवगत करवाया l अपने प्रवास के दौरान राधा कुंड के निकट, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ समय रुके थे उसी स्थान को "श्री चैतन्य महाप्रभु की बैठक" के नाम से प्रसिद्धि मिली। यहाँ आज भी नित्य पूजा साधना होती है। 

 

 श्री चैतन्य महाप्रभु को यह कुंड इतना प्रिय था कि वे अपनी साधना और ध्यान राधा कुंड के निकट ही किया करते थे, और इसी कारण राधा कुंड के निकट ही इस स्थान को "श्री चैतन्य महाप्रभु की बैठक" के नाम से प्रसिद्धि मिली l  

 

गौड़ीय वैष्णव आचार्य, श्री जीवा गोस्वामी अपनी पुस्तिका, श्रीगोपालचम्पूः में वर्णन करते है की, चैत्र पूर्णिमा के दिन राधा-श्याम कुंड श्री कृष्ण के दिव्य लीलाओं से प्रकट हुआ  एवं कार्तिक मास की बहुलाष्टमी के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने मानव कल्याण हेतु  पुनः इसका परिचय भक्तों को दिया l दोनों ही दिन भव्य भक्ति समारोह एवं श्री राधा-कृष्ण के अनुराग में परिपूर्ण इस शुभ दिन को मनाया जाता है l

 

राधा कुंड में परम भक्ति से प्रेरित हो स्नान करने से सभी प्रकार के विकारों और पापों से मुक्ति मिल जाती है एवं श्री राधा कृष्णा भक्ति का परमानन्द प्राप्त होता है।

राधा कुंड की दिव्य महिमा

 

राधा कुंड सभी संप्रदायों सहित सभी आचार्यों और उनके शिष्यों के लिए पूजा एवं साधना स्थली है। यहाँ की असाधारण दिव्यता और राधा कुंड का परिचय पा लेने वाले कई संतों एवं सन्यासियों ने यहाँ तपस्या की l इसी कारण से राधा कुंड के समीप अनेक महत्वपूर्ण स्थान है जैसे की-

श्री नित्यानंद प्रभु, जान्ह्वा माता, श्री रघुनाथ दासा गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री वल्लभाचार्य, श्रीला भक्तिविनोदा ठाकुर की भजन कुटीर एवं साधना स्थली l यहाँ गौड़ीय आचार्य विशेष- रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, कृष्णदास कविराज गोस्वामी, और रघुनाथ दास गोस्वामी जी के समाधी स्थल भी मौजूद है। बनखंडी महादेव शिव मंदिर, ललिता कुंड, पांडव घाट के अलावा यहीं श्री कृष्ण दास कविराज गोस्वामी की कुटिया भी स्थित है जहाँ उन्होंने श्री चैतन्य चरितामृत की रचना की l

 

राधा कुंड की महात्म्य का वर्णन श्रील प्रभुपाद द्वारा रचित, श्री उपदेशामृत के श्लोक 9 में मिलता है-

 

राधाकुण्डमिहापि गोकुलपतेः प्रेमामृताप्लावनात्कुर्यादस्य विराजतो गिरितटे सेवां विवेकी न कः ॥ ९ ॥

 

अर्थात राधा कुंड, जो गोकुल के स्वामी, श्री कृष्ण के श्री राधा के प्रति उनके दिव्य प्रेम को दर्शाता है l  सिद्ध भक्त राधा-कुंड में निवास करना पसंद करते हैं क्योंकि यह स्थान कृष्ण और राधारानी (रति-विलास) के बीच के शाश्वत प्रेम संबंधों की कई स्मृतियों का स्थल है।

श्रील भक्तिविनोदा ठाकुर ने अपनी पुस्तक अमृता-प्रवाह-भस्य में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा, राधा कुंड एवं श्याम कुंड को पुनः प्राकट्य कर भक्तों के कल्याण की इस घटना का अद्भुत उल्लेख किया है। अपने तीर्थ के दौरान जब गंगा, यमुना, सरस्वती संगम में पवित्र स्नान पश्चात्, श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्रजवासियों से राधा कुंड के बारें पूछा तो कोई उन्हें संतोषकारी उत्तर न दे सका।  प्रभु को ज्ञात हो गया की उनका प्रिय राधा कुंड समयचक्र के कारण अदृश्य हो गया है। परन्तु वे तो स्वयं परम पिता परमेश्वर है[1] , उन्होंने राधा कुंड और श्याम कुंड को एक खेत के पास पहचान लिया।  वहां बेहद थोड़ा सा पानी था, जिसमें उन्होंने स्नान किया तत्पश्चात विधि विधान से पूजा की तथा राधा कुंड की पवित्र मिटटी से उन्होंने तिलक किया। आस-पास के क्षेत्र के लोग श्री चैतन्य महाप्रभु को पूजा करते देख विस्मय से भर उठे जिसके बाद महाप्रभु ने, इस दिव्य कुंड की महिमा एवं महत्वता से भक्तों का पुनः परिचय करवाया। 

 

श्री चैतन्य चरित्रमृता, मध्य लीला में राधा कुंड की महिमा का अद्भुत वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार जैसे सभी गोपियों में राधारानी सबसे प्रिय हैं। इसी प्रकार, राधा-कुंड नामक झील भगवान को बहुत प्रिय है क्योंकि यह श्रीमती राधारानी को बहुत प्रिय है। राधा-कुंड का आकर्षण श्रीमती राधारानी के समान ही मधुर है। इसी प्रकार, कुंड [झील] की महिमा श्रीमती राधारानी की तरह ही महान है। उस झील में सर्व-ऐश्वर्यशाली भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमती राधारानी के साथ बड़े आनंद और दिव्य आनंद के साथ अपनी लीलाएं कीं।